1960 के दशक के अंत में, भारतीय रेलवे एक ही बिंदु पर 220, 132, 110, या 66kV पर थोक शक्ति खरीदने की ओर स्थानांतरित हो गया, अपनी स्वयं की ट्रांसमिशन लाइनें चलाते हुए तथा अपने स्वयं के सब-स्टेशन संस्थापित/संचालित/रखरखाव करते हुए — ट्रैक्शन शक्ति के स्रोत के तरीके में एक वास्तविक ऐतिहासिक मोड़।
ट्रांसफार्मर ब्रेकर बनाम फीडर ब्रेकर — वास्तविक भूमिकाएं
दो ट्रांसफार्मर सर्किट ब्रेकर प्रदान किए जाते हैं — एक प्राथमिक पक्ष पर, एक ट्रैक्शन ट्रांसफार्मर के द्वितीयक पक्ष पर। ट्रांसफार्मर ब्रेकर की वास्तविक भूमिका फीडर ब्रेकर हेतु बैकअप के रूप में कार्य करना है, जो सामान्य एवं असामान्य स्थितियों के तहत परिपथ तोड़ने का वास्तविक दिन-प्रतिदिन कर्तव्य निभाता है। एक पूर्ण ट्रैक्शन सब-स्टेशन में, यह ठीक 6 सर्किट ब्रेकर देता है: 2 प्राथमिक पक्ष पर, 2 द्वितीयक पर (ट्रांसफार्मर ब्रेकर, दोनों पक्षों हेतु बैकअप सुरक्षा), तथा 2 फीडर सर्किट ब्रेकर ओवरहेड उपकरण को आपूर्ति नियंत्रित करते हुए।
न्यूट्रल सेक्शन एवं सेक्टर संरचना — पहले के अध्यायों की पुष्टि
यह अध्याय पहले PSI तकनीकी मूल सिद्धांत अध्याय में शामिल सेक्टर/सब-सेक्टर संरचना की पुष्टि एवं विस्तार करता है: सब-स्टेशन एवं न्यूट्रल सेक्शन के बीच का खंड 'सेक्टर' कहलाता है, सब-सेक्शनिंग पोस्ट (10-15 km अंतराल) पर इंटरप्टर द्वारा सब-सेक्टर में आगे विभाजित। वोल्टेज ड्रॉप कम करने हेतु, एक पैरेलिंग इंटरप्टर के माध्यम से हर सब-सेक्शनिंग/सेक्शनिंग पोस्ट पर डबल-ट्रैक खंड की दोनों लाइनें समानांतर की जाती हैं। हर सेक्शनिंग पोस्ट पर, एक अंडर-वोल्टेज रिले सहित ब्रिजिंग इंटरप्टर आपातकाल के दौरान एक सब-स्टेशन से आसन्न सब-स्टेशन के खंड में फीड विस्तारित करने में सक्षम बनाता है — पहले स्विचिंग स्टेशन निरीक्षण जांच सूची से 'SP पर अंडर वोल्टेज रिले संचालन' मद से सीधे मेल खाता है।
सब-स्टेशन लेआउट — 10 वास्तविक RDSO-मानकीकृत प्रकार
सब-स्टेशन लेआउट ट्रैक के सापेक्ष ट्रांसमिशन लाइनों के अभिविन्यास से प्रभावित होता है — समानांतर या समकोण पर। इन संयोजनों के आधार पर, RDSO ने 10 अलग सब-स्टेशन लेआउट प्रकार मानकीकृत किए हैं, उपकरण के बीच भौतिक/विद्युत निकासी, फेज़-से-फेज़ निकासी, फेज़-से-ग्राउंड निकासी, तथा अनुभागीय निकासी को उचित विचार देते हुए विकसित किए गए।
ट्रैक्शन पावर ट्रांसफार्मर — वास्तविक क्षमता विकास
- प्रारंभिक विद्युतीकरण चरण: 7.3 एवं 10 MVA ट्रांसफार्मर।
- अधिकांश बाद की परियोजनाओं ने 13.5 MVA पर मानकीकरण किया — औसत सब-स्टेशन अंतराल, ढोए जाने वाले लोड, एवं खंड ढाल के आधार पर रीडिंग मानकीकृत।
- भारी ढुलाई ट्रेनों एवं बढ़े हुए यातायात के साथ, 13.5 MVA अपर्याप्त हो गया — चल रही विद्युतीकरण योजनाएं अब 21.6 MVA ट्रांसफार्मर का उपयोग करती हैं।
- विशेष रूप से उच्च-यातायात-घनत्व मार्गों पर, 30 MVA ट्रांसफार्मर आज़माए जा रहे हैं (प्रायोगिक/पायलट चरण, अभी तक मानक नहीं)।
ट्रैक्शन ट्रांसफार्मर पारंपरिक से अलग क्यों हैं
ट्रैक्शन ट्रांसफार्मर वास्तव में पारंपरिक वितरण ट्रांसफार्मर से अलग कर्तव्यों का सामना करते हैं — पीकी लोड, तीव्र लोड भिन्नता, एवं बार-बार शॉर्ट सर्किट के अधीन — इसलिए उनकी वाइंडिंग को 5 वास्तविक तनाव-कारक सेवा स्थितियों को सहन करने हेतु विशेष रूप से सुदृढ़ किया जाता है:
- बार-बार शॉर्ट सर्किट।
- बार-बार लोड भिन्नता।
- आपूर्ति वोल्टेज में बार-बार भिन्नता।
- OFF स्थिति से ट्रांसफार्मर के बार-बार ON स्विचिंग से मैग्नेटाइज़िंग इनरश करंट।
- निर्दिष्ट के अनुसार ट्रांसफार्मर का अतिभार (पहले ट्रांसफार्मर अतिभार क्षमता अध्याय में शामिल वास्तविक 50%/15मिनट एवं 100%/5मिनट अतिभार रेटिंग से जुड़ता है)।